मानव
अधिकारों
की
सार्वभौम
घोषणा
१० दिसम्बर १९४८ को यूनाइटेड नेशन्स
की जनरल असेम्बली ने मानव अधिकारों की
सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित
किया । इसका पूर्ण पाठ आगे के पृष्ठों में दिया
गया है । इस ऎतिहासिक कार्य के बाद ही असे-
म्बली ने सभी सदस्य देशोंसे अपील की कि वे इस
घोषणा का प्रचार करें और देशों अथवा प्रदेशों
को राजनॅतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का
विचार किए बिना, विशेषतः स्कूलों और अन्य
शिक्षा संस्थाओं में इसके प्रचार, प्रदर्शन, पठन
और व्याख्या का प्रबन्ध करें ।
  इसी घीषणा का सरकारी पाठ संयुक्त राष्ट्रीं
की इन पांच भाषाओं में प्राप्य हैः—अंग्रेजी,
चीनी, फांसीसी, रूसी ओर स्पेनिश । अनुवाद
का जो पाठ यहां दिया गया है, वह भारत सर-
कार द्वारा स्वीकृत है ।
मानव अधिकारों को सार्वभौम
घोषणा
प्रस्तावना
  चूंकि मानव परिवार के सभी सदस्यों के
जन्मजात गोरव और समान तथा अविच्छिन्न
अधिकार की स्वीकृति ही विश्व-शान्ति, न्याय
ओर स्वतन्त्रता की बुनियाद है,
  चूंकि मानव अधिकारों के प्रति उपेक्षा और
घृणा के फलस्वरूप ही ऐसे बर्बर कार्य हुए जिनसे
मनुष्य की आत्मा पर अत्यावार किया गया,
चूंकि एक ऐसी विश्व-व्यवस्था की उस स्थापना
को ( जिसमें लोगों को भाषण और धर्म की
आजादी तथा भय और अभाव से मुक्ति मिलेगी )
सर्वसाधारण के लिए सर्वोच्च आकांक्षा घोषित
किया गया है,
   चूंकि अगर अन्याययुवत शासन और जुल्म
के विरुद्घ लोगों को विद्रोह करने के लिए—उसे
ही अग्तिम उपाय समझ कर—मजबूर नहीं हो
जाना है, तो कानून द्दारा नियम बनाकर मानव
अधिकारों को रक्षा करना अनिवार्य है,
   चूंकि राष्ट्रों के बीच मॅन्नीपूर्ण सम्बन्धों को
बढ़ाना जरूरी है,
   चूंकि संयुक्त राष्ट्रों के सदस्य देशों की जन-
ताओं ने बुनियादी मानव अधिकारों में, मानव
व्यक्तित्व के औरव और योग्यता में और नर-
नारियों के समान अधिकारों में अपने विश्वास
को अधिकार-पत्र में दुहराया है और यह निश्चय
किया है कि अधिक व्यापक स्वतन्त्रता के अन्त-
र्गत सामाजिक प्रगति एवं जीवन के बेहतर स्तर
को ऊंचा किया जाय,
   चूंकि सदस्य देशों ने यह प्रतिज्ञा को है कि
वे संयुक्त राष्ट्रोंके सहयीग से मानव अधिकारों
और बुनियादी आजादियों के प्रति सार्वभौम
सम्मान को वृद्घि करेंगे,
   चूंकि इस प्रतिज्ञा को पूरी तरह से निभाने
के लिए इन अधिकारों और आज्रादियों का
स्वरूप ठीक-ठीक समझना सबसे अधिक जरूरी
है । इसलिए, अब,
सामान्य सभा
घोषित करती है कि
मानव अधिकारों को यह सार्वभौम घोषणा सभी
देशों और सभी लोगों की समान सफलता है ।
इसका उद्देश्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति और
समाज का प्रत्येक भाग इस घोषणा को लगातार
दृष्टि में रखते हुए अघ्यापन और शिक्षा के द्दारा
यह प्रयत्र करेगा कि इन अधिकारों और आज्रा-
दियों के प्रति सम्मान की भावना जाप्रत हो,
और उत्तरोत्तर ऐसे राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय
उपाय किये जाएं जिनसे सदस्य देशों की जनपा
तथा उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों की जनता
इन अधिकारों की सार्वभौम और प्रभावोत्पदक
स्वीकृति दे और उनका पालन करावे ।
अनुच्छेद १. सभी मनुष्यों को गौरव और
अधिकारों के मामले में जन्मजात स्वतन्न्नता और
समानता प्राप्त है । उन्हें बुद्घि और अन्तरात्मा
को देन प्राप्त है और परस्पर उन्हें भाईचारे के
भाव से बर्ताव करना चाहिए ।
अनुच्छेद २.  सभी को इस घोषणा में सन्निहित
सभी अधिकारों और आजादियों को प्राप्त करने
का हक़ है और द्बस मामले में जाति, वर्ण, लिग,
भाषा, धर्म, राजनीति या अन्य विचार-प्रणालो,
किसी देश या समाज विशेष में जन्म, सम्पत्ति या
किसी प्रकार की अन्य मर्यादा आदि के कारण
भेदभाव का विचार न किया जायगा ।
    इसके अतिरिक्त, चाहे कोई देश या प्रदेश
स्वतन्न्न हो, संरक्षत हो, या स्वशासन रहित हे
या परिमित प्रभुसत्ता वाला हो, उस देश या
प्रदेश की राजनँतिक, क्षेत्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय
स्थिति के आधार पर वहां के निवासियों के प्रति
कोई फ़रक़ न रखा जाएगा ।
अनुच्छेद ३. प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वाधीनता
और वँयक्तिक सुरक्षा का अधिकअर है ।
अनुच्छेद ४.  कोई भी ग़ुलामी या दासता की
हालत में न रखा जाएगा, ग़ुलामी-प्रथा और
ग़ुलामों का व्यापार अपने सभी रूपों में निषिद्व
होगअ ।
अनुच्छेद ५. किसी को भो शारीरिक यअतना न
दी जाएगी और न किसो के भी प्रति निर्दय,
अमनुषिक या अपमानजनक व्यवहार होगा ।
अनुच्छेद ६. हर किसी को हर जगह क़ानून की
निग़ाह में व्यक्ति के रूप में स्वीकृति-प्राप्त का
अधिकार है ।
अनुच्छेव ७. क़ानून की निगाह में सभी समान हँ
और सभी बिना भेदभाव के समान क़ानूनी सुरक्षा
के अधिकारी है । यदि इस घोषणा का अति-
कमण करके कोई भी भेद-भाव किया ज